मृत्यु और मृत्यु-पार के रहस्य
सजग मृत्यु के प्रयोग
निद्रा, स्वप्न, सम्मोहन व मूर्च्छा के पार — जागृति
सूक्ष्म शरीर, ध्यान व तंत्र-साधना के गुप्त आयाम
विषय सूची
प्रवचन 1 : आयोजित मृत्यु अर्थात ध्यान और समाधि के प्रायोगिक रहस्य
प्रवचन 2 : आध्यात्मिक विश्व आंदोलन—ताकि कुछ व्यक्ति प्रबुद्ध हो सकें
प्रवचन 3 : जीवन के मंदिर में द्वार है मृत्यु का
प्रवचन 4 : सजग मृत्यु और जाति-स्मरण के रहस्यों में प्रवेश
प्रवचन 5 : स्व है द्वार—सर्व का
प्रवचन 6 : निद्रा, स्वप्न, सम्मोहन और मूर्च्छा से जागृति की ओर
प्रवचन 7 : मूर्च्छा में मृत्यु है और जागृति में जीवन
प्रवचन 8 : विचार नहीं, वरन् मृत्यु के तथ्य का दर्शन
प्रवचन 9 : मैं मृत्यु सिखाता हूं
प्रवचन 10 : अंधकार से आलोक और मूर्च्छा से परम जागरण की ओर
प्रवचन 11 : संकल्पवान—हो जाता है आत्मवान
प्रवचन 12 : नाटकीय जीवन के प्रति साक्षी चेतना का जागरण
प्रवचन 13 : सूक्ष्म शरीर, ध्यान-साधना एवं तंत्र-साधना के कुछ गुप्त आयाम
प्रवचन 14 : धर्म की महायात्रा में स्वयं को दांव पर लगाने का साहस
प्रवचन 15 : संकल्प से साक्षी और साक्षी से आगे तथाता की परम उपलब्धि
उद्धरण : मैं मृत्यु सिखाता हूं - पहला प्रवचन - ध्याआयोजित मृत्यु अर्थात न और समाधि के प्रायोगिक रहस्य
"मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आत्मा अमर नहीं है। मैं यह कह रहा हूं कि आत्मा की अमरता का सिद्धांत मौत से डरने वाले लोगों का सिद्धांत है। आत्मा की अमरता को जानना बिलकुल दूसरी बात है। और यह भी ध्यान रहे कि आत्मा की अमरता को वे ही जान सकते हैं, जो जीते जी मरने का प्रयोग कर लेते हैं। उसके अतिरिक्त कोई जानने का उपाय नहीं। इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है।
मौत में होता क्या है? प्राणों की सारी ऊर्जा जो बाहर फैली हुई है, विस्तीर्ण है, वह वापस सिकुड़ती है, अपने केंद्र पर पहुंचती है। जो ऊर्जा प्राणों की सारे शरीर के कोने-कोने तक फैली हुई है, वह सारी ऊर्जा वापस सिकुड़ती है, बीज में वापस लौटती है।
प्राणों की जो ऊर्जा फैली हुई है जीवन की, वह सिकुड़ती है, वापस लौटती है अपने केंद्र पर। नई यात्रा के लिए फिर बीज बनती है, फिर अणु बनती है। यह जो सिकुड़ाव है, इसी सिकुड़ाव से, इसी संकोच से पता चलता है कि मरा! मैं मरा! क्योंकि जिसे मैं जीवन समझता था, वह जा रहा है, सब छूट रहा है। हाथ-पैर शिथिल होने लगे, श्वास खोने लगी, आंखों ने देखना बंद कर दिया, कानों ने सुनना बंद कर दिया। ये तो सारी इंद्रियां, यह सारा शरीर किसी ऊर्जा के साथ संयुक्त होने के कारण जीवंत था। वह ऊर्जा वापस लौटने लगी। देह तो मुर्दा है, वह फिर मुर्दा रह गई। मृत्यु के इस क्षण में पता चलता है कि जा रहा हूं, डूब रहा हूं, समाप्त हो रहा हूं।
और इस घबराहट के कारण कि मैं मर रहा हूं, यह इतनी ज्यादा चिंता पैदा कर देती है मन में कि वह उस मृत्यु के अनुभव को भी जानने से वंचित रह जाता है। जानने के लिए चाहिए शांति। हो जाता है इतना अशांत कि मृत्यु को जान नहीं पाता।
नहीं, मरने के क्षण में नहीं जाना जा सकता है मौत को। लेकिन आयोजित मौत हो सकती है। आयोजित मौत को ही ध्यान कहते हैं, योग कहते हैं, समाधि कहते हैं। समाधि का एक ही अर्थ है कि जो घटना मृत्यु में अपने आप घटती है, समाधि में साधक चेष्टा और प्रयास से सारे जीवन की ऊर्जा को सिकोड़कर भीतर ले जाता है, जानते हुए।"—ओशो
* this is a hardcover book and comes in a sealed wrap.
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