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Ek Omkar Satnam - Osho

Ek Omkar Satnam - Osho
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Ek Omkar Satnam - Osho

एक ओंकार सतनाम

नानक-वाणी पर ओशो के प्रवचनों ने कुछ ऐसी चीजों को लेकर मेरे आंख-कान खोले, जिनके बारे में पहले ज्यादा नहीं जानता था। हर अमृत वेला के समय में मैंने ओशो के प्रवचनों को सुना, जिनमें ओशो व्याख्या के लिए वेद-उपनिषदों और मुस्लिम सूफी संतों की शिक्षाओं का उल्लेख करते हैं। इससे मेरा यह विश्वास और भी दृढ़ हो गया कि ओशो हमारे देश में जन्मी महान आत्माओं में से एक हैं। ओशो के ये प्रवचन केवल सिखों के लिए ही नहीं, बल्कि उन सबके लिए उपयोगी हैं जो स्वयं को भक्ति-मार्ग की परंपरा से अवगत करना चाहते हैं।
खुशवंत सिंह
अंतर्राष्टीय ख्याति-प्राप्त
लेखक एवं पत्रकार

नानक ने परमात्मा को गा-गाकर पाया। गीतों से पटा है मार्ग नानक का। इसलिए नानक की खोज बड़ी भिन्न है। नानक ने योग नहीं किया, तप नहीं किया, ध्यान नहीं किया। नानक ने सिर्फ गाया। और गाकर ही पा लिया। लेकिन गाया उन्होंने इतने पूरे प्राण से कि गीत ही ध्यान हो गया, गीत ही योग बन गया, गीत ही तप हो गया। ओशो

विषय सूची

प्रवचन 1 : आदि सचु जुगादि सचु
प्रवचन 2 : हुकमी हुकमु चलाए राह
प्रवचन 3 : साचा साहिबु साचु नाइ
प्रवचन 4 : जे इक गुरु की सिख सुणी
प्रवचन 5 : नानक भगता सदा विगासु
प्रवचन 6 : ऐसा नामु निरंजनु होइ
प्रवचन 7 : पंचा का गुरु एकु धिआनु
प्रवचन 8 : जो तुधु भावै साई भलीकार
प्रवचन 9 : आपे बीजि आपे ही खाहु
प्रवचन 10 : आपे जाणै आपु
प्रवचन 11 : ऊचे उपरि ऊचा नाउ
प्रवचन 12 : आखि आखि रहे लिवलाइ
प्रवचन 13 : सोई सोई सदा सचु साहिब
प्रवचन 14 : आदेसु तिसै आदेसु
प्रवचन 15 : जुग जुग एको वेसु
प्रवचन 16 : नानक उतमु नीचु न कोइ
प्रवचन 17 : करमी करमी होइ वीचारु
प्रवचन 18 : नानक अंतु न अंतु
प्रवचन 19 : सच खंडि वसै निरंकारु
प्रवचन 20 : नानक नदरी नदरि निहाल

उद्धरण : एक ओंकार सतनाम - पहला प्रवचन - आदि सचु जुगादि सचु
"नानक ने गृहस्थ को और संन्यासी को अलग नहीं किया। क्योंकि अगर कर्ता परमेश्वर अलग है सृष्टि से, तो फिर तुम्हें सृष्टि के काम-धंधे से अलग हो जाना चाहिए। जब तुम्हें कर्ता पुरुष को खोजना है तो कृत्य से दूर हो जाना चाहिए, कर्म से दूर हो जाना चाहिए। फिर बाजार है, दूकान है, काम-धंधा है, उससे अलग हो जाना चाहिए।

नानक आखिर तक अलग नहीं हुए। यात्राओं पर जाते थे; और जब भी वापस लौटते तो फिर अपनी खेती-बाड़ी में लग जाते। फिर उठा लेते हल-बक्खर। पूरे जीवन, जब भी वापस लौटते घर, तब अपना कामधाम शुरू कर देते। जिस गांव में वे आखिर में बस गए थे, उस गांव का नाम उन्होंने करतारपुर रख लिया था--कर्ता का गांव।

अगर परमात्मा कर्ता है, तो तुम यह मत समझना कि वह दूर हो गया है कृत्य से। एक आदमी मूर्ति बनाता है। जब मूर्ति बन जाती है तो मूर्तिकार अलग हो जाता है, मूर्ति अलग हो जाती है। दो हो गए। मूर्तिकार के मरने से मूर्ति नहीं मरेगी। मूर्तिकार मर जाए, मूर्ति रहेगी। मूर्ति के टूटने से मूर्तिकार नहीं मरेगा। मूर्ति टूट जाए, मूर्तिकार बचेगा। दोनों अलग हो गए। परमात्मा और उसकी सृष्टि में ऐसा फासला नहीं है।

फिर परमात्मा और उसकी सृष्टि में कैसा संबंध है? वह ऐसा है जैसे नर्तक का। एक आदमी नाच रहा है, तो नृत्य है, लेकिन क्या तुम नृत्य को और नृत्यकार को अलग कर सकोगे? नृत्यकार घर चला जाए, नृत्य तुम्हारे पास छोड़ जा सकेगा? नृत्यकार मरेगा, नृत्य मर जाएगा। नृत्य रुकेगा, फिर वह आदमी नर्तक न रहा। दोनों संयुक्त हैं।…इसलिए नानक कहते हैं, कुछ छोड़ कर कहीं भागना नहीं है। जहां तुम हो, वहीं वह छिपा है। इसलिए नानक ने एक अनूठे धर्म को जन्म दिया है, जिसमें गृहस्थ और संन्यासी एक है। और वही आदमी अपने को सिक्ख कहने का हकदार है, जो गृहस्थ होते हुए संन्यासी हो; संन्यासी होते हुए गृहस्थ हो। सिर के बाल बढ़ा लेने से, पगड़ी बांध लेने से कोई सिक्ख नहीं होता। सिक्ख होना बड़ा कठिन है। गृहस्थ होना आसान है। संन्यासी होना आसान है; छोड़ दो, भाग जाओ जंगल। सिक्ख होना कठिन है। क्योंकि सिक्ख का अर्थ है--संन्यासी, गृहस्थ एक साथ। रहना घर में और ऐसे रहना जैसे नहीं हो। रहना घर में और ऐसे रहना जैसे हिमालय पर हो। करना दूकान, लेकिन याद परमात्मा की रखना। गिनना रुपए, नाम उसका लेना।"—ओशो


* this is a hardcover book and comes in a sealed wrap.

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  • Model: Ek Omkar Satnam - Osho
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